संस्कृत वाङ्गय में मोटे-अनाज का प्रयोग एवं वर्तमान प्रासङ्गिकता
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ये सर्वविदित है कि हमारी भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन होने के साथ वैज्ञानिकता से परिपूर्ण भी है। जहां पूरी दुनिया जल तथा भयंकर से भयंकर बीमारियों से जूझ रही है क्योंकि भूमिगत जल एवं उर्वरक का एक बडा भाग आज हमारे कृषि मे उपयोग होता है जिसका समाधान हमारे पूर्वजों ने आदि काल से ही मोटे अनाज के रूप में किया था, परिणामतः इसमें पानी कम उ
पयोग होता है तथा उर्वरक का भी उपयोग नहीं होता जो अनेक रोग का जनक है। श्री अन्न (मोटा अनाज) मनुष्यों के लिए ज्ञात सबसे प्रचीन खाद्य पदार्थों में से एक है। प्रायः घरेलू प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाने वाला प्रथम् अनाज है। प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में इन्हें कुधान्य अर्थात कुत्सित धान्य के रूप में वर्गीकृत किया गया है तथा वर्तमान हिन्दी बोलचाल की भाषा में इन्हें मोटे अनाज के रूप में कहा जाता है एवं आङ्ग्ल भाषा में "MILLETS" के रूप में ज्ञात है। जैसा कि हमे ज्ञात है कि मोटे अनाज की खेती भारत में अति प्राचीन एवं पौराणिक है। भारतीय हडप्पाकालीन सभ्यता से लेकर वैदिक संस्कृत एवं लौकिक संस्कृत साहित्य में मोटे अनाज तथा उनके गुणों के साक्ष्य पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होते हैं -


